2019 को बाइपास क्यों कर रहे हैं पीएम मोदी?
पीएम मोदी ने बीते 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश की जनता को चौथी बार संबोधित किया. तमाम बातों के दौरान उन्होंने देशवासियों को 'न्यू इंडिया' का सपना दिखाया. उन्होंने 'न्यू इंडिया' के इस सपने को 2022 तक साकार करने के लिए जुट जाने का आह्वान भी किया. 2017 में अगर 2022 की बात अगर पीएम कर रहे हैं तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि वो 2019 को बायपास कर रहे हैं. क्योंकि अभी तो इस पर होनी चाहिए कि 2014 में जो वादे किए गए थे, सपने दिखाए गए थे, वो किस हद तक 2019 में पूरे हो रहे हैं? उनकी प्रोग्रेस क्या है? 2019 में आम चुनाव होने हैं. जब चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री भाषण देने मंच पर पहुंचेंगे तो क्या उस वक्त वो 2019 तक सरकार ने क्या किया, इस पर बात नहीं करेंगे? उस वक्त भी 2022 तक 'न्यू इंडिया' बनाने की बात होगी?
16 मई 2014 को आम चुनाव के नतीजे आए तो देश की जनता को नए नेतृत्व से तमाम उम्मीदें बंधी. बंधनी भी चाहिए थी. चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी ने लोगों को हसीन सपने जो दिखाए थे. यूपीए सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल में जिन-जिन मुद्दों को लेकर उस वक्त की विपक्षी पार्टी बीजेपी ने सोनिया-मनमोहन की टीम को घेरा था. उन मुद्दों को मोदी एंड टीम ने चुनाव प्रचार में बखूबी भुनाया. एक नारा खूब मशहूर हुआ था- 'उन्हें 60 साल दिए, हमें केवल 60 महीने दीजिए. हम सबकुछ बदल कर रख देंगे.' जनता ने इसी उम्मीद में दिल खोलकर बीजेपी को वोट दिया. इस उम्मीद के साथ कि पांच साल में देश में बहुत कुछ बदल जाएगा.
लेकिन, साढ़े तीन बीत जाने के बाद क्या वाकई देश में बहुत कुछ बदल गया है? केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद तमाम तरह की लोक लुभावन घोषणाएं की. पुरानी योजनाओं को नया नाम देकर देश को चमकाने के सपने दिखाए गए. लोगों को भरोसा दिलाया गया कि चुनाव पूर्व किए गए 'अच्छे दिन' के वादे हकीकत में बदलेंगे. 'इंडिया' को फोकस कर योजनाएं शुरू की गईं. 'मेक इन इंडिया' की खूब चर्चा रही. लगा कि देश में खूब रोजगार आए. देश इकोनॉमी के मोर्चे पर खूब तरक्की करेगा. लेकिन मई 2014 के बाद से अबतक रोजगार के कितने अवसर पैदा हुए? अब प्रधानमंत्री कहने लगे हैं कि देश का युवक रोजगार मांगने वाला नहीं, रोजगार देने वाला बने. प्रधानमंत्री जी, जब किसी को रोजगार मिलेगा तभी तो वो दूसरों को रोजगार दे सकेगा.
मोदी सरकार ने वोट बैंक के जुगाड़ में उज्ज्वला योजना शुरू कर गरीबों तक एलपीजी सिलेंडर पहुंचाने का जितना काम किया, उससे अधिक इसकी ब्रांडिंग की. फिर लोगों से एलपीजी पर मिलने वाली सब्सिडी त्याग करने की अपील कर सरकारी खजाने में पैसे बचाने का खेल शुरू हुआ. अब सरकार एलपीजी पर मिलने वाली सब्सिडी को अगले साल मार्च तक पूरी तरह खत्म करने के मिशन में जुटी हुई है. दिक्कत यहां 100-200 रुपये के तौर पर मिलने वाली सब्सिडी को खत्म करने से नहीं है. बल्कि देखा जाए तो यह देश में सोशल वेलफेयर की बुनियाद को धीरे-धीरे ध्वस्त करने की साजिश है. आप देख रहे होंगे कि आजकल रेलवे के टिकट पर लिखा होता है कि सरकार आपके सफर का करीब आधा हिस्सा वहन करती है. यानी मुसाफिरों को अहसास दिलाया जाता है कि सरकार आपके ऊपर अहसान कर रही है. लेकिन, ये अहसान है? आपके सिस्टम की लापरवाही से एक झटके में 25 मुसाफिरों की जानें चली जाती हैं. और ऐसा करीब हर 6 महीने पर हो जाता है.
प्रधानमंत्री जी, शायद आप इसलिए भी 2019 को नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि आपके सामने विपक्ष दम तोड़ता दिख रहा है. जिन राज्यों में बीजेपी चुनाव जीत रही है वहां पार्टी की सरकार तो बन ही रही है. जिन राज्यों में बीजेपी हार रही है, वहां तो बीजेपी जरूर सरकार बना रही है. केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी में गजब का आत्मविश्वास है. वो भारत विजय के अभियान पर निकली है और अब तक वो बहुत हद तक सफल भी दिख रही है. इनके मिशन में अधिक से अधिक राज्यों में आपकी हुकूमत चलाना है. बीजेपी जब विपक्ष में थी तो जिन मुद्दों को लेकर बात-बात पर सड़क पर उतर जाती थी, आज जब बीजेपी सत्ता में है और वैसे मुद्दे सामने आते हैं तो विपक्ष कहीं दिखता ही नहीं है. जब पत्रकार सवाल पूछते हैं तो उन्हें संवेदनशीलता बरतने की सलाह दी जाती है.
हाल में यूपी में गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में कथित तौर पर ऑक्सीजन की सप्लाई रुकने की वजह से 60 से ज्यादा नौनिहाल काल के गाल में समा गए. सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले पीएम मोदी की तरफ से इस घटना को लेकर हफ्ते भर तक संवेदना के दो शब्द सुनने के लिए लोगों के कान तरस गए. उम्मीद थी कि जब आजादी की 70वीं सालगिरह के मौके पर जब पीएम लाल किले से भाषण देंगे तो गोरखपुर की घटना को लेकर कुछ बड़ी बात कहेंगे. लेकिन उन्होंने प्राकृतिक आपदा की भूमिका बनाते हुए गोरखपुर के गंभीर मसले को किस तरह बाइपास कर दिया, इसका गवाह देश की जनता बनी. फिर लगा कि देश के बदहाल हेल्थ सिस्टम पर प्रधानमंत्री कुछ बड़े ऐलान करेंगे. लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. शिक्षा के क्षेत्र में सरकार क्या कर रही है, सरकार ने इस बारे में भी कुछ नहीं कहा. ताकि प्राइवेट स्कूलों की भारी भरकम फीस के बोझ से परेशान मध्य वर्ग कुछ राहत की सांस ले सके.
देखा जाए तो साढ़े तीन साल बाद बदला क्या है? प्राकृतिक आपदाओं पर मान लीजिए किसी का जोर नहीं है लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर कुछ बदलाव तो दिखने ही चाहिए थे. इन बदलाव पर कुछ बात करने के बजाय कभी नोटबंदी तो कभी जीएसटी का राग छेड़कर जनता को उलझा दिया जा रहा है. अब 'न्यू इंडिया' का नया जुमला जो 2022 तक न आपको कुछ कहने देगा ना सोचने देगा. वैसे 1999 से 2004 तक एनडीए की सरकार देश में रही. वाजपेयीजी के कार्यकाल में देश में हुई तरक्की का दिवास्वप्न 'शाइनिंग इंडिया' के तौर पर दिखाया गया. लेकिन हासिल क्या हुआ? बीजेपी के हाथ से सत्ता गई भी तो पांच साल के लिए नहीं, बल्कि पूरे 10 साल तक पार्टी सत्ता से बाहर रही. यानी जनता सबकुछ देखती है, समझती है. सत्ता को यह समझाने के लिए विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने या जुमले गढ़ने की जरूरत नहीं होती.
16 मई 2014 को आम चुनाव के नतीजे आए तो देश की जनता को नए नेतृत्व से तमाम उम्मीदें बंधी. बंधनी भी चाहिए थी. चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी ने लोगों को हसीन सपने जो दिखाए थे. यूपीए सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल में जिन-जिन मुद्दों को लेकर उस वक्त की विपक्षी पार्टी बीजेपी ने सोनिया-मनमोहन की टीम को घेरा था. उन मुद्दों को मोदी एंड टीम ने चुनाव प्रचार में बखूबी भुनाया. एक नारा खूब मशहूर हुआ था- 'उन्हें 60 साल दिए, हमें केवल 60 महीने दीजिए. हम सबकुछ बदल कर रख देंगे.' जनता ने इसी उम्मीद में दिल खोलकर बीजेपी को वोट दिया. इस उम्मीद के साथ कि पांच साल में देश में बहुत कुछ बदल जाएगा.
लेकिन, साढ़े तीन बीत जाने के बाद क्या वाकई देश में बहुत कुछ बदल गया है? केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद तमाम तरह की लोक लुभावन घोषणाएं की. पुरानी योजनाओं को नया नाम देकर देश को चमकाने के सपने दिखाए गए. लोगों को भरोसा दिलाया गया कि चुनाव पूर्व किए गए 'अच्छे दिन' के वादे हकीकत में बदलेंगे. 'इंडिया' को फोकस कर योजनाएं शुरू की गईं. 'मेक इन इंडिया' की खूब चर्चा रही. लगा कि देश में खूब रोजगार आए. देश इकोनॉमी के मोर्चे पर खूब तरक्की करेगा. लेकिन मई 2014 के बाद से अबतक रोजगार के कितने अवसर पैदा हुए? अब प्रधानमंत्री कहने लगे हैं कि देश का युवक रोजगार मांगने वाला नहीं, रोजगार देने वाला बने. प्रधानमंत्री जी, जब किसी को रोजगार मिलेगा तभी तो वो दूसरों को रोजगार दे सकेगा.
मोदी सरकार ने वोट बैंक के जुगाड़ में उज्ज्वला योजना शुरू कर गरीबों तक एलपीजी सिलेंडर पहुंचाने का जितना काम किया, उससे अधिक इसकी ब्रांडिंग की. फिर लोगों से एलपीजी पर मिलने वाली सब्सिडी त्याग करने की अपील कर सरकारी खजाने में पैसे बचाने का खेल शुरू हुआ. अब सरकार एलपीजी पर मिलने वाली सब्सिडी को अगले साल मार्च तक पूरी तरह खत्म करने के मिशन में जुटी हुई है. दिक्कत यहां 100-200 रुपये के तौर पर मिलने वाली सब्सिडी को खत्म करने से नहीं है. बल्कि देखा जाए तो यह देश में सोशल वेलफेयर की बुनियाद को धीरे-धीरे ध्वस्त करने की साजिश है. आप देख रहे होंगे कि आजकल रेलवे के टिकट पर लिखा होता है कि सरकार आपके सफर का करीब आधा हिस्सा वहन करती है. यानी मुसाफिरों को अहसास दिलाया जाता है कि सरकार आपके ऊपर अहसान कर रही है. लेकिन, ये अहसान है? आपके सिस्टम की लापरवाही से एक झटके में 25 मुसाफिरों की जानें चली जाती हैं. और ऐसा करीब हर 6 महीने पर हो जाता है.
प्रधानमंत्री जी, शायद आप इसलिए भी 2019 को नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि आपके सामने विपक्ष दम तोड़ता दिख रहा है. जिन राज्यों में बीजेपी चुनाव जीत रही है वहां पार्टी की सरकार तो बन ही रही है. जिन राज्यों में बीजेपी हार रही है, वहां तो बीजेपी जरूर सरकार बना रही है. केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी में गजब का आत्मविश्वास है. वो भारत विजय के अभियान पर निकली है और अब तक वो बहुत हद तक सफल भी दिख रही है. इनके मिशन में अधिक से अधिक राज्यों में आपकी हुकूमत चलाना है. बीजेपी जब विपक्ष में थी तो जिन मुद्दों को लेकर बात-बात पर सड़क पर उतर जाती थी, आज जब बीजेपी सत्ता में है और वैसे मुद्दे सामने आते हैं तो विपक्ष कहीं दिखता ही नहीं है. जब पत्रकार सवाल पूछते हैं तो उन्हें संवेदनशीलता बरतने की सलाह दी जाती है.
हाल में यूपी में गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में कथित तौर पर ऑक्सीजन की सप्लाई रुकने की वजह से 60 से ज्यादा नौनिहाल काल के गाल में समा गए. सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले पीएम मोदी की तरफ से इस घटना को लेकर हफ्ते भर तक संवेदना के दो शब्द सुनने के लिए लोगों के कान तरस गए. उम्मीद थी कि जब आजादी की 70वीं सालगिरह के मौके पर जब पीएम लाल किले से भाषण देंगे तो गोरखपुर की घटना को लेकर कुछ बड़ी बात कहेंगे. लेकिन उन्होंने प्राकृतिक आपदा की भूमिका बनाते हुए गोरखपुर के गंभीर मसले को किस तरह बाइपास कर दिया, इसका गवाह देश की जनता बनी. फिर लगा कि देश के बदहाल हेल्थ सिस्टम पर प्रधानमंत्री कुछ बड़े ऐलान करेंगे. लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. शिक्षा के क्षेत्र में सरकार क्या कर रही है, सरकार ने इस बारे में भी कुछ नहीं कहा. ताकि प्राइवेट स्कूलों की भारी भरकम फीस के बोझ से परेशान मध्य वर्ग कुछ राहत की सांस ले सके.
देखा जाए तो साढ़े तीन साल बाद बदला क्या है? प्राकृतिक आपदाओं पर मान लीजिए किसी का जोर नहीं है लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर कुछ बदलाव तो दिखने ही चाहिए थे. इन बदलाव पर कुछ बात करने के बजाय कभी नोटबंदी तो कभी जीएसटी का राग छेड़कर जनता को उलझा दिया जा रहा है. अब 'न्यू इंडिया' का नया जुमला जो 2022 तक न आपको कुछ कहने देगा ना सोचने देगा. वैसे 1999 से 2004 तक एनडीए की सरकार देश में रही. वाजपेयीजी के कार्यकाल में देश में हुई तरक्की का दिवास्वप्न 'शाइनिंग इंडिया' के तौर पर दिखाया गया. लेकिन हासिल क्या हुआ? बीजेपी के हाथ से सत्ता गई भी तो पांच साल के लिए नहीं, बल्कि पूरे 10 साल तक पार्टी सत्ता से बाहर रही. यानी जनता सबकुछ देखती है, समझती है. सत्ता को यह समझाने के लिए विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने या जुमले गढ़ने की जरूरत नहीं होती.
2014 की जीत में मोदी मात्र मुखौटा थे...ये जीत कॉरपोरेट शक्तियों ने अभूतपूर्व प्रचार के ज़रिए गढ़ी थी...अब ये मोदी से आर्थिक सुधारों का दूसरा चरण शुरू कराना चाहती है जिसमें वेलफयर सब्सिडी जैसा कोई प्रावधान शेप ना रहे...ऐसा करते ये भूला जा रहा है कि कॉरपोरेट ड्रिवन मीडिया मैनेज किया जा सकता है, जनभावनाओं का अंडर करंट नहीं....
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