NDA की बम्पर वापसी और महागठबंधन की दुर्गति क्यों हुई?
बिहार का जनादेश आ गया है। पिछले 20 साल से बिहार के सीएम नीतीश कुमार पर जनता ने फिर से भरोसा जताया है। दूसरी तरफ तेजस्वी यादव और राहुल गांधी की जोड़ी नहीं चल सकी। वैसे तो एक्ज़िट पोल ने एनडीए की वापसी के संकेत दे दिये थे लेकिन इस तरह की बम्पर जीत का अंदाजा शायद एनडीए के नेताओं को भी नहीं होगा। चुनाव के नतीजे आने के बाद तमाम विश्लेषण भी आ रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जो इन परिणामों की वजह रही हैं।
देखा जाए तो NDA की कामयाबी के पीछे मुख्य तौर पर तीन 'इंजन' रहे, जिन्होंने गठबंधन की जीत की राह आसान की।
1. 'साइलेंट वोटर' महिला शक्ति
नीतीश कुमार जब से सीएम बने हैं, उनका फोकस महिला वोटरों पर रहा है। चाहे वो स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल बांटने की योजना हो या शराबबंदी। इन महिला केंद्रित योजनाओं ने NDA के पक्ष में एक मजबूत 'साइलेंट वोट बैंक' बनाया। शराबबंदी, जीविका, पंचायती राज में महिलाओं को आरक्षण और साइकिल/पोशाक योजना जैसी पहलें निर्णायक साबित हुईं।
सर्वेक्षणों के मुताबिक, महिला मतदाताओं ने पुरुषों की तुलना में 10-15% अधिक NDA को वोट दिया। मुफ्त राशन, पक्का मकान और ₹10,000 की सीधी मदद जैसी केंद्र की योजनाओं को भी महिलाओं ने NDA के विकास मॉडल से जोड़कर देखा।
2. मोदी का करिश्मा और केंद्रीय योजनाएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यापक अपील और विश्वसनीयता ने शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में NDA के लिए वोटों को मजबूत किया। "डबल इंजन" की सरकार के वादे ने मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि राज्य में विकास की गति बनाए रखने के लिए केंद्र का समर्थन जरूरी है। गरीब कल्याण योजनाओं, खासकर मुफ्त अनाज वितरण और आयुष्मान भारत का लाभ सीधे जनता तक पहुँचा, जिसने एंटी-इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के असर को कम किया।
3. अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) और ओबीसी पर पकड़
NDA, खासकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) और ओबीसी के बड़े हिस्से के बीच अपनी गहरी पैठ बनाई। यह वर्ग पारंपरिक रूप से किसी एक पार्टी का गढ़ नहीं रहा है, लेकिन नीतीश कुमार के नेतृत्व और केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय के नैरेटिव के मेल ने उन्हें NDA की तरफ आकर्षित किया। NDA अपनी पारंपरिक सवर्ण वर्ग के वोट बैंक को बनाए रखने के साथ-साथ इन वर्गों के वोटों को कुशलतापूर्वक सीटों में बदलने में सफल रहा।
इन सभी के अलावा चुनाव से पहले वृद्धा, विधवा और विकलांग पेंशन की राशि बढ़ाकर नीतीश सरकार ने वोटरों को लुभाने की कोई कसर नहीं छोड़ी।
महागठबंधन की हार के कारण
इस बार के चुनाव में महागठबंधन की हार उतनी ही निर्णायक रही जितनी NDA की जीत। इसके पीछे संगठन और रणनीति की कई बड़ी चूकें जिम्मेदार रहीं।
1. 'जंगलराज' का नैरेटिव
NDA राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाली सरकार के पुराने कार्यकाल के 'जंगलराज'की आशंकाओं को हवा दी। मोदी और शाह जैसे बड़े नेता लालू राज का डर दिखाकर वोटरों को बिखरने से रोकने में कामयाब रहे। शायद यही वजह रही कि युवाओं के बीच रोजगार का मुद्दा उठाने के बावजूद, कानून-व्यवस्था और सुशासन पर मतदाताओं का भरोसा नीतीश कुमार के पक्ष में बना रहा। RJD 'तेजस्वी बनाम मोदी-नीतीश' की लड़ाई में विश्वसनीयता के मोर्चे पर पिछड़ गया।
2. गठबंधन में समन्वय की कमी
महागठबंधन के भीतर घटक दलों का प्रदर्शन असंतोषजनक रहा। कांग्रेस का निराशाजनक स्ट्राइक रेट महागठबंधन की हार का सबसे बड़ा कारण बना। 61 सीटों पर चुनाव लड़कर कांग्रेस कुछ ही सीटें जीत पाई, जिससे गठबंधन की जीत की संभावनाएँ खत्म हो गईं। कई सीटों पर RJD और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच जमीनी स्तर पर समन्वय की कमी साफ रूप से दिखाई दी।
3.वोटबैंक में बिखराव और अति-आत्मविश्वास
RJD का पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) वोट बैंक तो एकजुट रहा, लेकिन इस कोर वोट को EBC, दलितों (खासकर महादलितों) और उच्च जातियों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया। महागठबंधन ने अपनी रैलियों में उमड़ी भीड़ को वोटों में बदलने के मामले में अति-आत्मविश्वास दिखाया, जिससे जमीनी संगठन पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना जरूरी था।
बात जन सुराज की भी कर लेते हैं। प्रशांत किशोर की यह पहल एक राजनीतिक क्रांति की तरह थी, लेकिन इसे स्थापित राजनीतिक ढांचे, संगठनात्मक ताकत और वोटिंग पैटर्न को बदलने के लिए पर्याप्त समय और मज़बूत चुनावी चेहरे नहीं मिल पाए। बिहार का चुनाव मुख्य रूप से NDA बनाम महागठबंधन के बीच एक सीधा मुकाबला बन गया। जब दो बड़े गठबंधन मैदान में होते हैं, तो मतदाता अक्सर अपने वोटों को 'बर्बाद' होने से बचाने के लिए किसी तीसरे विकल्प को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, भले ही उन्हें वह विकल्प पसंद हो। शायद जन सुराज के साथ भी यही हुआ हो।
इस परिणाम ने न सिर्फ बिहार की राजनीति की दिशा तय की है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी कई संदेश दिए हैं।

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